MY ENEMY IS SO POWERFUL THAT, I CANNOT THINK OF A NORMAL HUMAN BEING’S LIFE ANYMORE, MY GREATEST REGRET IS THAT I CAN’T RETALIATE THE WAY I WOULD LIKE TO. THIS M.F. MADE ME SO HELPLESS. I CANT USE ANY ELECTRONIC ITEMS LIKE OTHER PEOPLE DOES…!. NO MUSIC SYSTEMS, NO RADIOS, COMPUTER, MOBILE. IF I DO EVERYTHING NORMALLY THEN THAT’S GOING TO BE A RECOGNITION OF MY TALENTS….!. THAT’S WHAT THIS GUYS WANT TO PREVENT. IF THEIR CLAIMS ON ME PROVES WRONG THEY HAVE LOT OF EXPLANATIONS TO DO…..!. SO I’M SILENTLY SUFFERING…..! THANKS TO MANORAMA, M.R.F, CHURCH, MUTHOOT, AND THE PARTY…..!.THEY DENIED ME A DECENT LIFE . ALL MY KNOWN PEOPLE , FRIENDS BECOMES MY ENEMY OVERNIGHT. ALL MY FUNDAMENTAL RIGHTS IS BEING DENIED FOR UNKNOWN REASONS….!. I’M FIGHTING WITH A SHADOW SINCE TIME UNKNOWN…….!. MY RIGHT TO PRACTICE MY RELIGION WITHOUT ANY FEAR OR INTERRUPTION IS ALSO DENIED….!. I’M LIVING AT THE MERCY OF AN KNOWN FORCE WHO DOESN’T WANT TO REVEAL HIS IDENTITY……!. RAMDAS MAY OUT FOR A WHILE BUT ,HE IS NOT DEAD: THAT’S THE MESSAGE I WANT TO SHARE WITH MY WELL WISHERS IF THERE IS ANYONE LEFT IN THAT CATEGORY ……!
– “VANAYIDATHU PATTUPURATHU MADAMPI RAMDAS SWAMI’नवद्वारम पुरम गत्वा सततं नियतो वशी
ईश्वरः सर्वलोकेषु स्थावरस्य चरस्य च
तमेवाहुरणुभ्योंअणुम तं महाद्भूयो महत्तरम
बहुधा सर्वभूतानि व्याज्य तिष्ठति शाश्वतं
क्षेत्रज्ञमेकत: कृत्वा सर्वे क्षेत्रमथैकत:
एवं संविमृशोज्ञIनि संयत: सततं हृदि
” नौ द्वार वाले नगर (शरीर) में जाकर वह सदा नियम पूर्वक निवास करता हैं….!. सब को वश में रखता हैं….!. सम्पूर्ण कोकों में चराचर प्राणियों का शासन करनेवाला ईश्वर भी वाही हैं ….!. उसे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं…..!. वह नाना प्रकार के सभी प्राणियों को व्याप्त करके सदा स्थित रहता हैं….!. क्षेत्रज्ञ को एक ऑर करके दूसरी ऑर सम्पूर्ण क्षेत्र को पृथक करके रखे हैं….!. संयमपूर्वक रहनेवाला ज्ञiनि पुरुष सदा इस प्रकार अपने ह्रदय में विचार करता रहे - जड़ ऑर चेतन की पृथकता का विवेचन किया करे…..!
(Source: krishna.com)
सा हि सर्वेषु भूतेशु स्थावारेषु चरेषु च I
वासत्येको महावीर्यो नानाभावसमन्वित: II
नैव चोहर्वे न तिर्यक च नाधस्तान्न कदाचन I
इन्द्रियेरिः बुध्या व न दृश्येत कदाचन II
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नाना भावों से युक्त वह महापराक्रमी परमात्मा अकेला हि सम्पूर्ण चराचर भूतों में निवास करता हैं ….!. वह न ऊपर , न अगल- बगल में और न नीचे हि कभी दीखायी देता हैं….!. वह यहाँ इन्द्रियों अधवा बूढी के द्वारा कदापि दीखायी नहीं देता ……!.
(Source: bharatadesam.com)
अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येषमरमाश्रितम
यः पश्येत परमात्मानं बंधनैय: सा विमुच्यते “
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” जो सम्पूर्त्न मर्त्य शरीरों में अव्यक्त भाव से स्थित एवं अमर हैं, उस परमात्मा को जो देखता हैं , वह बंधनों से मुक्त हो जाता हैं…..!.
(Source: srimadbhagavatam.org)
हरि जीउ गुफा अंदरि रखिकै वाजा पवणु वजाईआ II
वजाईआ वाजा पउण नउ दुआरे परगटु किए दसवा गुपतु रखाइआ II
गुरदुआरै लई भावनी इकना दसवा दुआरु दिखाईआ II
तह अनेक रूप नाऊ नव निधि तिस दा अंतु न जाई पाईआ II
कहै नानकु हरि पिआरै जीवु गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाईआ II
(Source: gsingh.us)
1 ). जिष्णु रथेष्ठा: समयों युवास्य
यजमानस्य वीरो जायतां I
“निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु
फलवत्यो न ओषधय: पच्यान्ताम
योगक्षेमे न: कल्पताम “
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” इस यज्ञ के याग्मान के घर पुत्र हो
विजयी , प्रखर वक्ता, युवा, रथचारी , वीर
ब्रह्मन , हमारे राष्ट्र में
होती रहे वर्षा याधावश्यक सदा
ओषधी बनती रहे फलवत अपने समय से
सर्वदा स्थिर हो हमारा योगक्षेम “
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TO HIM WHO OFFERS THIS SACRIFICE,
MAY A YOUTHFUL HEROIC SON BE BORN , A CHAMPION
A CHARIOT FIGHTER, A PERSUASIVE SPEAKER IN ASSEMBLIES
MAY HEAVEN RAIN IN ACCORDANCE WITH OUR NEEDS,
MAY OUR PLANTS RIPEN AND BEAR FRUITS IN SEASON,
MAY JOY AND PROSPERITY BE TO US….!”
यजुर्वेद :- २२/२२
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२ ). आ ब्रह्मन ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायताम I
आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इशाब्योअतिव्याधि महारथो जायताम I
दोग्घ्री धेनुर वोदानंग्वान आशु: प्राप्ति: पुरुन्धिर योषा I
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“ब्रह्मन , भगवान् हमारे राष्ट्र में
ज्ञान से भास्वान ब्राह्मण जन्म ले
योधा हमारे शूर, तीरंदाज़ और महारधी
हो , दूधरु गाय , बैल सशक्त , वेगी अश्व हो,
हो स्त्रियाँ गृहिणी कुशल ….!”
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IN THIS OUR COUNTRY , O BRAHMAN
MAY THE PRIESTS BE BORN BRILLIANT WITH SACRED KNOWLEDGE,
MAY THE WARRIORS BE BORN BRAVE,
SKILLFUL ARCHERS, EXCELLENT MARKSMEN,
INVINCIBLE CHARIOT FIGHTERS
MAY THE COWS YIELD PLENTY OF MILK ,
THE OXEN BE TIRELESS, THE HORSES BE SWIFT,
THE WOMEN BE SKILLFUL HOUSEWIVES….!
यजुर्वेद :- २२/२२
(Source: indiasite.com)
“भगवान शंकर का माहात्म्य ……!”
” इन्त ते कीरतयिश्यामी नमस्कृत्य कपर्दिने
यदवाप्तम मया राजन्ज्छ्रेयो याच्चार्जितम यश:
प्रयत: प्रातरुधाय यदधीये विशम्पते
प्रांजलि शतरुद्रियम तन्मे निगत: शृणु
प्रजापतिरस्तत ससृजे तपसोअते महातपा:
शंकरस्त्वसृजत तट प्रजा: स्थावरजंगमा:
नास्ति किंचित्परम भूतं महादेवत विशामपते
इह त्रिषवापि लोकेषु भूतानाम प्रभवो हि स:I
न चैवात्सहते स्थातुम कश्चिदग्रे महात्मन: II
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यतेI
गंधेनापि हि संग्रामे तस्य कृध्स्य शत्रव: II
विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च I
घोरं च निनदम तस्य पर्जन्यानिनदोपमम II
श्रूत्वा विशीरयेधदयम देवानामपि संयुगे I
थाहूच घोरेण रूपेण पश्येत क्रुद्ध: पिनाक धृत II
न सूरा नासुरा लोके न गन्धर्वो न पन्नगा:I
कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागता: II “
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महभारत - अनुशासन . दान . १६० /३-१०
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“में जटाजूटधारी भगवान शंकर को नमस्कार करके प्रसन्नता पोर्र्वक यह कह रह हुम , की मैंने कौन-सा श्रेय प्राप्त किया और किस यश का उपार्जित किया प्रजानाथ …I, में प्रति दिन प्रातकाल उठकर मन और इन्द्रियों को संयम रखते हुए हाथ जोड़कर जिस शतरुद्रीय की जप एवं पाठ करता हूँ उसे बता रहा हूँ सुनो …..I. महातपस्वी प्रजापति ने तपस्या के अंत में उस शत्रुद्रीय की रचना की और शंकरजी ने समस्त चरचारों की सृष्टि की ….I. परजनाथ , तीनों लोकों में महादेवजी से बढ़कर दूसर कोई श्रेष्ठ देवता नहीं; क्योंकि वे समस्त प्राणियों की उत्पत्ति के कारण हैं …..I. उन महात्मा शंकर के सामने कोई भी खड़ा होने का सहस नहीं कर सकता ……I. तीनों लोकों में कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं हैं…..I. संग्राम में जब वे कुपित होते हैं , उस समय उनकी गंध से भी सारे शत्रु अचेत और मृतप्राय हो कर थर-थर काँपने एवं गिरने लगते हैं….I. संग्राम में मेघगर्जना के सामान गंभीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी ह्रदय विदीर्ण हो सकता हैं…..I. पिनाकधारी रूद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकर रूप से देख ले , उनके भी ह्रदय के टुकड़े -टुकड़े हो जाएँ …I. संसार में भगवान शंकर के कुपित हो जाने पर देवता , असुर , गन्धर्व, और नाग यदि भागकर गुफा में छिप जाएँ, तो भी सुखसे नहीं रह सकते…..I. 
Sree Muthappan and Dogs
Muthappan Temple
Sree Muthappan is always accompanied by a dog. Dogs are considered sacred here and one can see dogs in large numbers in and around the temple.
One can see two carved bronze dogs at the entrance of the temple that are believed to symbolize the bodyguards of the God. When the Prasad is ready it is first served to a dog that is always ready inside the temple complex.
Local legends enhance the importance of dogs to Sree Muthappan, such as the story that follows:
“A few years ago, temple authorities decided to reduce the number of dogs inside the temple; so they took some dogs and puppies away. From that very day, the performer of the Sree Muthappan Theyyam was unable to perform; it is said that the spirit of Sree Muthappan enters the performer’s body for the duration of the ceremony. But He probably refused to enter the Theyyam performer’s body because the dogs had been removed. Realizing their mistake, the dogs were brought back to the temple by the temple authorities. From that day onwards, Theyyam performances returned to normal ……!”


